Fading away…

(by Sesha Reddigari )

कभी कभी लगता है के मैं एक पढ़ी हुवी किताब हूँ 
जो अब अल्मारी के शेल्फ पर से सदा तरसती है 
के फिर मुझे यहां से उठाकर पढ़नेवाला कोई है


सालों से वही बचपन वाली आंखमिचौली खेल रहा हूँ
लेकिन अब पता लग रहा है के कोई दोस्त मुझे ढूंढ नहीं रहा

मैं ओ अब्दुल्ला हूँ जिसकी बन रही है ज़िन्दगी दिन ब दिन बेगानी
पता नहीं के इस बेमक़सत बेगानी ज़िन्दगी में कर रहा हूँ क्या