(by Sesha Reddigari )

Image: Sesha Reddigari 2020
कभी कभी लगता है के मैं एक पढ़ी हुवी किताब हूँ
जो अब अल्मारी के शेल्फ पर से सदा तरसती है
के फिर मुझे यहां से उठाकर पढ़नेवाला कोई है
सालों से वही बचपन वाली आंखमिचौली खेल रहा हूँ
लेकिन अब पता लग रहा है के कोई दोस्त मुझे ढूंढ नहीं रहा
मैं ओ अब्दुल्ला हूँ जिसकी बन रही है ज़िन्दगी दिन ब दिन बेगानी
पता नहीं के इस बेमक़सत बेगानी ज़िन्दगी में कर रहा हूँ क्या…